Sunday, 6 March 2016

वेद और पुनर्जन्म


वेद और पुनर्जन्म

कुछ पाश्चात्य विद्वानों की यह धारणा रही हैं की वेद पुनर्जन्म के सिद्धांत का समर्थन नहीं करते हैं। भारतीय लेखक भी पश्चिम के लेखकों का अँधा अनुसरण करते दीखते हैं। इसका एक कारण तो वेदों के अर्थो को सूक्षमता से नहीं समझना हैं और दूसरा कारण मुख्यत: रूप से सभी पाश्चात्य विद्वान ईसाई मत के थे इसलिए पूर्वाग्रह से ग्रसित थे। ईसाई मत वेदों में वर्णित कर्म फल व्यस्था और पुनर्जन्म को नहीं मानता इसलिए वेदों में भी पुनर्जन्म के न होना मानता हैं। 
स्वामी दयानंद अपने प्रसिद्द ग्रन्थ ऋग्वेददिभाष्यभूमिका में पुनर्जन्म के वेदों से स्पष्ट प्रमाण देते हैं। इसके अतिरिक्त अन्य विद्वानों ने भी पुनर्जन्म के अन्य प्रमाण दिए हैं।

  1. हे सुखदायक परमेश्वर! आप कृपा करे पुनर्जन्म में हमारे बीच में उत्तम नेत्र आदि सब इन्द्रिया स्थापित कीजिये। तथा प्राण अर्थात मनबुद्धिचितअहंकारबलपराक्रम आदि युक्त शरीर पुनर्जन्म में कीजिये।


2. हे सर्वशक्तिमान! आपके अनुग्रह से हमारे लिए वारंवार पृथ्वी प्राण कोप्रकाश चक्षु को और अंतरिक्ष स्थानादि अवकाशों को देते रहें। पुनर्जन्म में सोम अर्थात औषधियों का रस हमको उत्तम शरीर देने में अनुकूल रहे तथा पुष्टि करनेवाला परमेश्वर कृपा करके सब जन्मों में हमको सब दुःख निवारण करनेवाली पथ्यरूप स्वस्ति को देवे।


3. हे सर्वज्ञ ईश्वर! जब जब हम जन्म लेवेंतब तब हमको शुद्ध मन. पूर्ण आयुआरोग्यताप्राणकुशलतायुक्त जीवात्माउत्तम चक्षु और श्रोत्र प्राप्त हो।


4. हे जगदीश्वर! आप की कृपा से पुनर्जन्म में मन आदि ग्यारह इन्द्रिय मुझको प्राप्त हो अर्थात सर्वदा मनुष्य देह ही प्राप्त होता रहे।

5. जो मनुष्य पुनर्जन्म में धर्माचरण करता हैंउस धर्माचरण के फल से अनेक उत्तम शरीरों को धारण करता और अधर्मात्मा मनुष्य नीच शरीर को प्राप्त होता हैं।


 6. जीवों को माता और पिता के शरीर में प्रवेश करके जन्मधारण करनापुन: शरीर को छोड़नाफिर जन्म को प्राप्त होनावारंवार होता हैं।


7. तुम तुम शरीरधारी रूप में उत्पन्न होकर अनेक योनियों में अनेक प्रकार के मुखों वाले भी हो जाते हो


8. यह जीवात्मा कभी किसी का पिताकभी पुत्रकभी बड़ाकभी छोटा हो जाता हैं। 


9. मैंने इन्द्रियों के रक्षक अमर इस आत्मा का साक्षात्कार किया जो जन्म-मरण के मार्गों से विचरण करता रहता हैं। वह अपने अच्छे-बुरे कर्मों के अनुसार और प्रीतीपूर्वक अनेक योनियों में संसार के अंदर भ्रमण करता रहता हैं।


10. हे जीवों! तुम जब शरीर को छोड़ो तब यह शरीर दाह के पीछे पृथ्वीअग्नि आदि और जलों के बीच देह-धारण के कारण को प्राप्त हो और माताओं के उदरों में वास करके फिर शरीर को प्राप्त होता हैं।


11. जीव माता के गर्भ में बार बार प्रविष्ट होता हैं और अपने शुभ कर्मानुसार सत्यनिष्ठ विद्वानों के घर में जन्म लेता हैं।

इसी प्रकार से निरुक्त में यास्काचार्य ने पुनर्जन्म को माना हैं।

1. मैंने अनेक वार जन्ममरण को प्राप्त होकर नाना प्रकार के हज़ारों गर्भाशयों का सेवन किया।

2. अनेक प्रकार के भोजन कियेअनेक माताओं के स्तनों का दुग्ध पियाअनेक माता-पिता और सुह्रदयों को देखा।

3. मैंने गर्भ में नीचे मुख ऊपर पग इत्यादि नाना प्रकार की पीड़ाओं से युक्त होके अनेक जन्म धारण किये।

 दर्शन ग्रन्थ भी पुनर्जन्म का समर्थन करते हैं


1. हर एक प्राणियों की यह इच्छा नित्य देखने में आती हैं कि मैं सदैव सुखी बना रहूँ। मरूं नहीं। यह इच्छा कोई भी नहीं करता कि मैं न होऊं। ऐसी इच्छा पुनर्जन्म के अभाव से कभी नहीं हो सकती। यह "अभिनिवेश" क्लेश कहलाता हैंजोकि कृमि पर्यन्त को भी मरण का भय बराबर होता हैं। यह व्यवहार पुनर्जन्म की सिद्धि को जनाता हैं।

2. जो उत्पन्न अर्थात शरीर को धारण करता हैंवह मरण अर्थात शरीर को छोड़ केपुनरुत्पन्न दूसरे शरीर को भी अवश्य प्राप्त होता हैं। इस प्रकार मर के पुनर्जन्म लेने को प्रेत्यभाव कहते हैं।
गीता में आता हैं की जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्याग कर नए वस्त्रों को ग्रहण कर लेता हैं उसी प्रकार आत्मा पुराने व्यर्थ शरीरों को त्याग कर नवीन भौतिक शरीरों को धारण कर लेता हैं।
 इस प्रकार से रामायणमहाभारतउपनिषदपुराण आदि पुनर्जन्म के सिद्धांत का पुरजोर समर्थन करते हैं। पाश्चात्य विद्वान और उनकी सरणि पर चलने वाले भारतीय लेखकों को वेदों में पुनर्जन्म न मिलने का कारण उनकी वेदों के मूल अर्थों को समझने में अक्षमता हैं।

क्या ऋग्वेद का दशम मंडल पीछे से मिलाया गया है?

क्या ऋग्वेद का दशम मंडल पीछे से मिलाया गया है?

पश्चिमी लेखकों का यह मत हैं कि ऋग्वेद का दशम मंडल अर्वाचीन है एवं उसे बाद में मिलाया गया है। उनकी इस मान्यता का आधार दसवें मंडल में भाषा की भिन्नता है।
शंका 1- पश्चिमी लेखकों की मान्यता की ऋग्वेद का दसवां मंडल बाद में मिलाया गया है का आधार क्या हैं?
समाधानपश्चिमी लेखक मक्डोनेल द्वारा अपनी पुस्तक में अपनी इस मान्यता के समर्थन में कुछ युक्तियाँ दी गई हैं। जैसे



१. ऋग्वेद के दशम मंडल की भाषा भिन्न है।

२. मन्यु और श्रद्धा जैसे अमूर्त विचारों की अधिकता हैं।


३. विश्वेदेवा की प्रधानता हो गई है।

४. उषा देवी का मान कम होता दीखता है।

५. 20-26 सूक्तों का कर्ता अग्निमीले से आरम्भ करता हैंअत पहिले 9 मंडल पुस्तक रूप में भी आ चुके थे।

६.  क्यूंकि यह सोम अध्याय के पश्चात रखी गई हैं।

७. क्यूंकि इसके सूक्तों की संख्या प्रथम मंडल के बराबर हैं।

८. यहाँ तक की दशम मंडल के सूक्त अन्य मंडलों में की गई मिलावट से अधिक प्राचीन प्रतीत होते हैं।

पश्चिमी के साथ साथ अनेक भारतीय विद्वान भी इस विचार को सही मानते हैं। जैसे ऋग्वेद का दशम मंडल स्पष्टया पीछे की मिलावट है जिसमें अथर्ववेद जैसी जादू-टोने की बातें पाई जाती हैं।
दशम मंडल पहले ९ मंडलों की अपेक्षा पीछे बनायह बात भाषा की साक्षी से पूर्णतया निश्चित है।
ऋग्वेद का दशम मंडल अर्वाचीन माना जाता हैं।

ऋग्वेद मंडल १०सूक्त ९० मंत्र ११,१२ का पुरुष सूक्त अपनी भाषा और भावना से अर्वाचीन प्रतीत होता है।

दशम मंडल में लोकमोघविसर्गगुप् इत्यादि अनेक शब्द आते हैं जो सिवाय प्रक्षिप्त भागों और बालखिल्य सूक्तों के ऋग्वेद के अन्य भागों में नहीं पाये जाते हैं।



शंका 2- इस मान्यता को आप सही मानते है अथवा गलत मानते है?

समाधान-

            पश्चिमी लेखकों की मान्यता का विश्लेषण करते समय हमने यह पाया कि वास्तव में इस मान्यता का समाधान शुष्क एवं दुरूह हैं क्यूंकि यह भाषाविदों का विषय हैं। अधिक जानकारी के लिए शोध में रूचि रखने वाले विद्वान पंडित भगवत दत्त रिसर्च स्कॉलरपंडित शिवपूजन सिंह कुशवाहापंडित धर्मदेव विद्यामार्तण्ड द्वारा कृत लेख एवं पुस्तकें देख सकते हैं।
इस लेख में हम केवल लोकमोघविसर्ग आदि शब्दों का विश्लेषण करेंगे।
'लोकशब्द पर विचार

लोक: शब्द ऋग्वेद के दशम मंडल के अतिरिक्त ऋग्वेद 1/93/6, 2/30/6,3/2/9,4/17/17,6/23/7,6/47/8,6/73/2,7/20/2, 7/33/5, 7/60/9, 7/84/2,7/99/4, 8/100/12, 9/92/6 आदि मन्त्रों में आया हैं फिर यह अयथार्थ एवं तथ्य विरुद्ध बात कैसे लिख दी।
'मोघशब्द पर विचार  मोघं का प्रयोग ऋग्वेद के दशम मंडल के अतिरिक्त ऋग्वेद के सप्तम मंडल में दो मन्त्रों 7/104/14, 7/104/15  में मिलता हैं फिर यह अयथार्थ एवं तथ्य विरुद्ध बात कैसे लिख दी।


'विसर्गशब्द पर विचार


विसर्ग का प्रयोग ऋग्वेद के दशम मंडल के अतिरिक्त ऋग्वेद के सप्तम मंडल में 103  सूक्त में मिलता है फिर यह अयथार्थ एवं तथ्य विरुद्ध बात कैसे लिख दी।
पंडित सत्यव्रत जी सामश्रमी ने त्रयीपरिचय ग्रन्थ में भाषा भेद की मान्यता का स्पष्ट रूप से निष्काशित करते हुए लिखते है कि हमारे सुनने में तो दशममण्डल और दूसरे मंडलों की भाषा एक ही तरह की है और हमारी बुद्धि में उनका तात्पर्य भी एक ही जैसा (अन्य मंडलों के सदृश) है। हम नहीं जानते कि किनकी बुद्धि मलिन है और कौन हठी हैं?
इस प्रकार से अनेक तर्कों और प्रमाणों द्वारा ऋग्वेद को अर्वाचीन बताने का जो प्रयास किया जा रहा है वह असत्य सिद्ध लिया जा सकता है।
शंका 3-

 पश्चिमी लेखक वेदों में बाद में मिलावट की कल्पना से क्या सिद्ध करना चाहते हैं?

समाधान- 


      पश्चिमी लेखकों की वेदों पर मान्यता का आधार ईसाई मत की मान्यताओं के पूर्वाग्रह से प्रभावित रहा हैं। इन्हीं मान्यताओं के चलते वेदों में बहुदेवतावाद्वेदों में इतिहासवेदों में जादू टोनाविकासवाद आदि को बलात सिद्ध करने का प्रयास किया गया। वेदों को जंगली लोगों की निकृष्ठ मान्यता एवं बाइबिल को सभ्य लोगो की उच्च मान्यता इसी प्रदूषित सोच का परिणाम था। जब उन्होंने ऋग्वेद के दसवें मंडल में हिरण्यगर्भ सूक्त में प्रतिपादित एकेश्वरवादनासदीय सूक्त आदि में ईश्वर द्वारा सृष्टि उत्पत्ति एवं पालनश्रद्धा सूक्तमन्यु सुक्तादि में आध्यात्मिकदार्शनिक और मनोवैज्ञानिक विषयों को देखा तो उन्होंने बच निकलने  रास्ता सोचा और इस मंडल को पीछे का बनाया हुआ प्रचारित कर दिया। भाषा-भेद तो एक बहाना भर था। उदहारण के लिए हम मैक्समूलर की मान्यता का विश्लेषण करते है।
हिरण्यगर्भ सूक्त को मैक्समूलर महोदय ने यूरोपियन व्याख्याकारों द्वारा नवीन होना बताया है। इस सूक्त के अंतिम मंत्र''प्रजापते न तवदेतान्यन्यो विश्वा जातानि परि ता बभूवपर मैक्समूलर महोदय लिखते है कि मेरे विचार में यह अंतिम मंत्र तो अत्यंत  संदिग्ध ।
सत्य यह है कि ऋग्वेद के इस सूक्त में एकेश्वरवाद अर्थात 'ईश्वर एक हैके मन्त्रों को देखकर मैक्समूलर ईसाईमत जन्य पक्षपात के शिकार हुए। पर वेदों के अनेक मंडलों में 'ईश्वर के एकहोने के पर्याप्त प्रमाण वर्णित हैं।


शंका 4-

        क्या वेदों में मिलावट की जा सकती है?
समाधान

          वेद नित्य ईश्वर का नित्य ज्ञान है। इसलिए जिस रूप में वेद इस कल्प में आज उपलब्ध होते हैंउसी रूप में में वे पिछले कल्पों में भी अनादिकाल से ईश्वर द्वारा प्रकट किये जाते रहे हैं तथा भविष्य में आने वाले अनंत कालों में भी वे इसी रूप में प्रकट किये जाते रहेंगे।  स्वामी दयानंद इस विषय को स्पष्ट रूप से लिखते है कि "जैसे इस कल्प की सृष्टि में शब्द,अक्षर और सम्बन्ध वेदों में हैंइसी प्रकार से पूर्व कल्प में थे और आगे भी होंगे। क्यूंकि जो ईश्वर की वोद्या है सो नित्य एक ही रस बनी रहती है। उनके एक अक्षर का भी विपरीत भाव कभी नहीं होता। सो ऋग्वेद से लेके चारों वेदों की संहिता अब जिस प्रकार की हैइनमें शब्दअर्थसम्बन्धपद और अक्षरों का जिस क्रम से वर्तमान हैइसी प्रकार का क्रम सब दिन बना रहता है। क्यूंकि ईश्वर का ज्ञान नित्य है। उसकी वृद्धिक्षय और विपरीतता कभी नहीं होती।"
इस तथ्य को पाणिनि ने अष्टाध्यायी में भी नित्य माना हैं  'वेद में स्वर तथा वर्णानुपूर्वी भी नित्य होती है।  निरुक्त में यास्क भी वेदमंत्रों की शब्द रचना और उनकी आनुपूर्वी को नियत मानते हैं। 
वेदों की नित्यता के पश्चात वेदों की शुद्धता की रक्षा का प्रबंध भी इतना वैज्ञानिक है कि उसमें प्रक्षेप करना असंभव हैं। क्रम के अतिरिक्त जटामालाशिक्षालेखाध्वजादण्डरथघन इन आठ प्रकारों से वेद मन्त्रों के उच्चारण का विधान किया गया हैं। इस पाठ्क्रम का विधान ऐतरेय अरण्यकप्रतिशाख्यादि में भी उसका उल्लेख है। इन जटामालाशिखा के नियम व्याड़ी ऋषि प्रणीत विकृति वल्ली नामक ग्रन्थ में पाये जाते हैं। वेदों के शुद्ध पाठ को सुरक्षित रखने के लिए इसी प्रकार से अनुक्रमणियां भी पाई जाती है।

विदेशी से लेकर स्वदेशी विद्वान वेदों की शुद्धता की रक्षा पर मोहित होकर अपने विचार लिखते है।

मैक्समूलर महोदय - ऋग्वेद की अनुक्रमणी से हम उसके सूक्तों और पदों की पड़ताल करके निर्भीकता से कह सकते हैं कि अब भी ऋग्वेद के मन्त्रोंशब्दों और पदों की वही संख्या है जो कात्यायन के समय थी।
वेदों के पाठ हमारे पास इतनी शुद्धता से पहुंचायें गए है कि कठिनाई से कोई पाठभेद अथवा स्वरभेद तक सम्पूर्ण ऋग्वेद में मिल सके।
मक्डोनेल महोदय लिखते है-
आर्यों ने प्राचीन काल से असाधारण सावधानता का वैदिक पाठ की शुद्धता रखने और उसे परिवर्तन अथवा नाश से बचाने के लिए उपयोग किया। इसका परिणाम यह  इतनी शुद्धता से सुरक्षित रखा गया है जो साहित्यिक इतिहास में अनुपम है।
इस प्रकार से पश्चिमी विद्वान वेदों में बाद के काल में हुई मिलावट की कल्पना ल स्वयं खंडन कर अपनी परिकल्पना को स्वयं सिद्ध कर रहे हैं।




Wednesday, 2 March 2016

क्या वेदों में जादू-टोना आदि अन्धविश्वास का वर्णन हैं?



क्या वेदों में जादू-टोना आदि अन्धविश्वास का वर्णन हैं?


वेदों के विषय में एक भ्रान्ति प्रचलित हो गई है कि वेदों में जादू-टोने आदि अन्धविश्वास का वर्णन हैं। इसका मुख्य कारण सायणाचार्य, महीधर आदि द्वारा वेदों के कुछ प्रकरणों में जादू-टोना को अन्धविश्वास के रूप में अपने भाष्य में वर्णन हैं। विदेशी लेखकों जैसे ब्लूमफील्ड आदि भी इस मान्यता का समर्थन करते दीखते हैं। अनेक भारतीय लेखक भी उन्हीं का अनुसरण कर इसी मान्यता का समर्थन करते प्रतीत होते हैं  वैदिक विद्वान श्री प्रियरत्न आर्ष के अनुसार जादू शब्द वेद के "यातु" शब्द का रूपान्तर या अपभ्रश है। यातु शब्द का अर्थ निघण्टु 2/19 के अनुसार हिंसा है। अथर्ववेद 8/8/6/18 में जादू, इंद्रजाल आदि का प्रयोग शत्रु सेना को नष्ट करने के लिए हुआ हैं जो पूर्ण रूप से वैज्ञानिक एवं सत्य है। जबकि तांत्रिक ग्रंथों में जादू-टोने के नाम पर कल्पित और अवैज्ञानिक वर्णन मिलते हैं। इस विषय में रामदास गौड़ की हिंदुत्व नामक पुस्तक में लिखते है कि "तंत्रोक्त, मरणोच्चाटन, वशीकरण, अभिचारिक क्रिया का प्रसंग अथर्ववेद संहिता में पाया जाता है सही, किन्तु तन्त्र के अन्यान्य प्रधान लक्षण नहीं मिलते। ऐसी दशा में तंत्र को हम अथर्व संहितामूलक नहीं कह सकते"। अथर्ववेद के विभिन्न मन्त्रों में शारीरिक और मानसिक रोगों का उपचार , शत्रु घात,अपने अंदर के रोगों और दोषों को हटाकर स्वास्थ्य एवं अच्छे गुणों को ग्रहण करने का सन्देश दिया गया हैं। इन मन्त्रों के मूल सन्देश को न समझ पाने के कारण इस भ्रान्ति का प्रचलन हुआ। 

हम यहाँ अथर्ववेद के कुछ सूक्तो एवं मंत्रो पर विचार कर यह सिद्ध करेगे की वेदों में जादू टोना या अश्लीलता नहीं है। अथर्ववेद के सूक्तों में मणि शब्द का प्रयोग कई स्थानों पर हुआ है। सायण आदि भाष्यकारों ने मणि का अर्थ वह पदार्थ किया हैं जिसे शरीर के किसी अंग पर बांधकर मंत्र का पाठ करने से अभिष्ट फल के प्राप्ति अथवा किसी अनिष्ट का निवारण किया जादू टोने से किया जा सकता हैं। मणि अथवा रत्न शब्द किसी भी अत्यंत उपयोगी अथवा मूल्यवान वस्तु के लिए प्रयोग हुआ हैं। उस वस्तु को अर्थात मणि को शरीर से बांधने का अर्थ है उसे वश में कर लेना, उसका उपयोग लेना, उसका सेवन करना आदि। 

कुछ मणि सूक्त इस प्रकार हैं





1. पर्णमणि- 



अथर्ववेद 3/5 सूक्त का अर्थ करते हुए सायण आचार्य लिखते हैं “जो व्यक्ति तेज, बल, आयु और धन आदि को प्राप्त करना चाहता हो, वह पर्ण अर्थात दाक के वृक्ष की बनी हुई मणि को त्रयोदशी के दिन दही और सहद में भिगोकर तीन दिन रखे और चौथे दिन निकलकर उस मणि को इस सूक्त के मंत्रो का पाठ करके बांध ले और दही और शहद को खा ले। इसी सूक्त में सायण लिखते हैं की यदि किसी राजा का राज्य छीन जाये तो काम्पील नमक वृक्ष की टहनियों से चावल पकाकर मंत्र का पाठ कर ग्रहण करे तो उसे राज्य की प्राप्ति हो जाएगी।”

सायण का अर्थ अगर इतना कारगर होता तो भारत के लोग जो की वेदों के ज्ञान से परिचित थे कभी भी पराधीन नहीं बनते, अगर बनते तो जादू टोना करके अपने आपको फिर से स्वतंत्र कर लेते। पर्ण का अर्थ होता हैं पत्र और मणि का बहुमूल्य इससे पर्णमणि का अर्थ हुआ बहुमूल्य पत्र। अगर कोई व्यक्ति राज्य का राजा बनना चाहता है तो राज्य के नागरिको का समर्थन (vote or veto) जो की बहुमूल्य है, उसे प्राप्त हो जाये तभी वह राजा बन सकता हैं। इसी सूक्त के दुसरे मंत्र में प्रार्थना हैं की राज्य के क्षत्रियो को मेरे अनुकूल कर, तीसरे मंत्र में राज्य के देव अर्थात विद्वानों को अनुकूल कर, छठे में राज्य के धीवर, रथकार लोग, कारीगर लोग, मनीषी लोग हैं उनके मेरे अनुकूल बनाने की प्रार्थना करी गई हैं। इस प्रकार इस सूक्त में एक अभ्यर्थी की राष्ट्र के नेता बनने की प्रार्थना काव्यमय शैली में पर्ण-मणि द्वारा व्यक्त करी गयी हैं। जादू टोने का तो कहीं पर नामो निशान ही नहीं है। 




2. जांगिडमणि




अथर्ववेद 2/4 सूक्त तथा 19/34-35 सूक्तों में जांगिडमणि की महिमा बताते हुए सायण लिखते हैं “जो व्यक्ति कृत्या (हिंसा) से बचना चाहता हो, अपनी रक्षा चाहता हो तथा विघ्नों की शांति चाहता हो, वह जांगिड पेड़ से बनी विशेष प्रकार की मणि को शण (सन) के धागे में पिरोकर मणि बांधने की विधि से इस सूक्त के मंत्रो को पड़कर बांध ले।” उसका मंतव्य पूर्ण हो जायेगा। 

अथर्ववेद के इन सूक्तों का ध्यान से विश्लेषण करने पर पता चलते हैं की जांगिड किसी प्रकार की मणि नहीं हैं, जिसको बांधने से हिंसा से रक्षा हो सके अपितु एक औषधि है जो भूमि से उत्पन्न होने वाली वनस्पति हैं , जो रोगों का निवारण करने वाली है। (अथर्व 19/34/9) रोगों की चिकित्सा करने वाली हैं (अथर्व 19/35/1,अथर्व 19/35/5, अथर्व 2/4/3) इस सूक्त में जो राक्षसों को मारने की बात कहीं गयी हैं। वो रोगजनक कृमिरूप (Microbes) शत्रु हैं जो रोगी बनाते हैं। 

यहाँ भी कहीं जादू टोने का नहीं अपितु आयुर्वेद का वर्णन हैं



3. शंखमणि


अथर्ववेद 4/10 सूक्त में शंखमणि का वर्णन हैं. सायण के अनुसार उपनयन संस्कार के पश्चात बालक की दीर्घ आयु के लिए शंख को इस सूक्त के मंत्रो के साथ बांध दे तथा यह भी लिखा हैं बाढ़ आ जाने पर रक्षा करने के लिए भी शंख बांध लेने से डूबने का भय दूर हो जाता हैं। 

सायण का मंतव्य विधान रूप से असंभव हैं अगर शंख बांधने से आयु बढ़ सकती हैं तो सायण ने स्वयं अपनी आयु क्यों नहीं बढाकर 100 वर्ष से ऊपर कर ली होती। अगर शंख बांधने से डूबने का खतरा नहीं रहता, तब तो किसी की भी डूबने से मृत्यु ही नहीं होती। सत्य यह है शंख को अथर्ववेद 4/10/3 में विश्व भेसज अर्थात अनेक प्रकार के रोगों को दूर करने वाला बताया गया है। अथर्ववेद 4/10/1 में रोगों को दुर्बल करने वाला बताया गया है। अथर्ववेद 4/10/2 में शंख को कृमि राक्षस को मरने वाला बताया गया है। अथर्ववेद 4/10/4 में शंख को आयु बढाने वाली औषधि बताया गया है। आयुर्वेद में शंख को बारीक़ पिस कर शंख भस्म बनाए का वर्णन हैं जिससे अनेक रोगों से मुक्ति मिलती हैं। 




4. शतवारमणि



अथर्ववेद 19/36 सूक्त का भाष्य करते हुए सायण लिखते हैं “जिस व्यक्ति की संताने मर जाती हो और इस प्रकार उसके कुल का क्षय हो रहा हो , वह इस सूक्त के मंत्रो को पढकर शतवारमणि को बांध ले तो उसका यह संकट दूर हो जाता है। ”

शतवारमणि कोई जादू टोने करने वाली वस्तु नहीं हैं अपितु एक औषधी है जिससे शरीर को बल मिलता है और रोगों का नाश होता हैं। 

ऊपर की पंक्तियो में हमने चार मणियो की समीक्षा पाठको के सम्मुख दी गई है। इनमे किसी में भी जादू टोने का उल्लेख नहीं है। प्रत्युत चार गुणकारी औषधियो का वर्णन हैं। जिनसे रोगनिवारण में बहुत उपयोगी होने के कारण मूल्यवान मणि कह दिया गया हैं।



5. कृत्या और अभिचार


अथर्ववेद में बहुत से स्थलों (19/34/4,2/4/6,8/5/2) पर कृत्या-अभिचार के प्रयागों का वर्णन मिलता है। सायण के भाष्य को पढ़ कर लगता हैं की अभिचार शब्द का अर्थ हैं किसी शत्रु को पीड़ा पहुचाने के लिए, उसे रोगी बनाने के लिए अथवा उसकी मृत्यु के लिए कोई विशेष हवन अथवा कर्म काण्ड का करना। कृत्या का अर्थ हैं ऐसे यज्ञ आदि अनुष्ठान द्वारा किसी की हिंसा कर उसे मार डालना। 

अभिचार का अर्थ बनता हैं विरोधी द्वारा शास्त्रों से प्रहार अथवा आक्रमण तथा कृत्या का अर्थ बनता हैं उस प्रहार से हुए घाव बनता हैं। मणि सूक्त की औषधियो से उस घाव की पीड़ा को दूर किया जा सकता हैं। यही इन मन्त्रों का मूल सन्देश हैं। 

इस प्रकार जहाँ भी वेदों में मणि आदि का उल्लेख हैं। वह किसी भी प्रकार जादू टोने से सम्बंधित नहीं हैं। आयुर्वेद के साथ अथर्ववेद का सम्बन्ध कर के विभिन्न औषधियो को अगर देखे तो मणि शब्द से औषधी का अर्थ स्पष्ट हो जाता हैं। 

अथर्ववेद को विनियोगो की छाया से मुक्त कर स्वंत्र रूप से देखे तो वेद मंत्र बड़ी सुंदर और जीवन उपयोगी शिक्षा देने वाले दिखने लगेगे और अथर्ववेद में जादू टोना होने के मिथक की भ्रान्ति दूर होगी। 

Rohith Vemula: Activist or Puppet



Rohith Vemula: Activist or Puppet

National media channels are running news of suicide by Rohith Vemula to pump adrenaline in their TRP rating. Politician from different parties are busy flying Hyderabad to show sympathy with the family of Rohith Vemula and as expected to secure Dalit votes. Secularist scholars of our country are busy writing blogs, articles and editorials to prove that Rohith Vemula was killed by Right wing Politics. But very few concentrated on educational carrier and activities of Rohith before his suicide.

I personally visited his facebook profile.

https://web.facebook.com/rohith352

I found Rohith posts related to these Topics.

1. Rohith was protesting against ABVP for preventing screening of Film “Muzaffarnagar Baaqi Hain”.
2. He was active in celebrating Manu Smriti Dahan Divas (Burning Day)
3. He was active in celebrating Babri Masjid demolition day along with Muslims in Campus.
4. He was active in organizing Beef festival in campus.
5. He was seen cheering Owaisi of AIMIM on intolerance issue.
6. He was seen cheering Muslim spokesperson on support to Tipu Sultan
7. Last but not the least he was foremost in speaking against hanging of Yakub Menon (This is not on FB but in News)

There was no Post on any education related activity on the wall of Rohith.

After reading this anyone can easily reach this interpretation that he was pro-Ambedkarite, pro-Muslims, anti-Hindus and against all system and traditions of our country.

Speaking against caste-system is not wrong. Even I am against it. But the motive should be well defined. My motive against caste system is to eradicate the evil and unite Hindus. Consider everyone as equal and son of almighty God.

1. The motive of Pro-Ambedkarite seems to spit venom against all higher caste Hindus (Even if they are not following caste system). This mentality only divides never unites any society.

2. Speaking against Manu Smriti (Even after this fact is established that Manu Smriti was adulterated with verses supporting caste system in the middle ages. This was done by ignorant class of people. Still people with vested interests are trying milking the barren cow again and again without any success.)

3. Support Muslims appeasement politics (Even by ignoring the Views of Dr Ambedkar in Islam. Read Dr. Ambedkar views on Islam in his book on Pakistan. Dr Ambedkar was offered millions to convert to Islam. He rejected all such offers considering Islam as foreign and impractical in approach. His followers just follow opposite to him. They team-up with Muslims and try to show that they are near to Islam than Hinduism. While it’s my personal opinion that they must collaborate with those Hindus who are against Caste system)

4. Organize Beef festivals to hurt Hindu sentiments. (A step to promote disunity and hatred in society. It’s common sense. Will dalits like to organize Pork Festival in front of Muslim students in University campus?)

5. Support fanatics like Tipu Sultan (Ignoring the fact that he ruined villages after villages of Hindus even belonging to dalits. No lesson learned from history.)

6. Support to movie on Muzaffarnagar (It came as a surprise to me as this man completely ignored the ground reality. This movie depicts Hindus as rioters and Muslims as victims. The ground reality is that in the Muzaffarnagar riot Muslim devastate Dalits from many Villages and the proclaimed savior of dalits in UP ex CM Mayawati did not come for any help. The reason being the main accused among rioters was related to her prestigious party BSP. How come this man ignored such Hard Fact?)

7. Support to Yakub Menon is silliest mistake. Menon was killer of innocent Indians in Mumbai. How come any one supports such anti national terrorist? This is quite mean and unworthy. No wise person will ever support such wrong act. One question always comes in my Mind. Will anyone among these Human Right activists dare to come forward if instead of Yakub Menon any person with Hindu Origin would have been hanged? Answer is a big “No”. This double standard criterion is quite prevalent in our secular country in name of Activism.

In short I consider this Activism as Anti-nation, Anti-humanity, Anti-cultural and Anti-social.

I have no second opinion to consider that these persons are puppets in the hands of Anti National forces.
(The author views are personal and its motive is not to hurt the sentiments of anyone living of dead but to propagate what is Truth and only Truth!)

क्या टीपू सुल्तान और औरंगजेब न्याय प्रिय शासक थे ?



अपने आपको सेक्युलर सिद्ध करने की होड़ में इतिहास के साथ छेड़ छाड़ करना बुद्धिमानों का कार्य नहीं है। टीपू सुल्तान और औरंगजेब को सेक्युलर, धर्म निरपेक्ष, हिन्दू हितेषी,हिन्दू मंदिरों और मठों को दान देने वाला, न्याय प्रिय और प्रजा पालक सिद्ध करने के लिए मुस्लिम संप्रदाय लेख पर लेख प्रकाशित कर रहा है। उनके लेखों में इतिहास की दृष्टी से प्रमाण कम हैं,शब्द जाल का प्रयोग अधिक किया गया है। परन्तु हज़ार बार चिल्लाने से भी असत्य सत्य सिद्ध नहीं हो जाता। इस लेख के माध्यम से यह सिद्ध किया गया हैं की औरंगज़ेब और टीपू सुल्तान मतान्ध एवं अत्याचारी शासक थे। मुसलमानों द्वारा हिन्दू युवकों को भ्रमित करने के लिए की जा रही यह कवायद निरर्थक एवं निष्फल सिद्ध होगी।



भाग 1- टीपू सुल्तान के जीवन की समीक्षा

टीपू सुल्तान को जानने के लिए उसके सम्पूर्ण जीवन में किये गए कार्य कलापों के बारे में जानना अत्यंत आवश्यक है। अपवाद रूप से एक-दो मंदिर , मठ को सहयोग करने से हजारों मंदिरों को नाश करने का, लाखों हिन्दुओं को इस्लाम में परिवर्तन करने का, हज़ारों की संख्या में हिन्दुओं की हत्या का दोष टीपू के माथे से धुल नहीं सकता हैं।  टीपू के अत्याचारों की अनदेखी कर उसे धर्म निरपेक्ष सिद्ध करने के प्रयास को हम बौधिक आतंकवाद की श्रेणी में रखे तो अतिश्योक्ति न होगी। सेक्युलर वादियों का कहना हैं की टीपू सुल्तान ने श्री रंगपटनम के मंदिर में और श्रृंगेरी मठ में दान दिया एवं मठ के शंकराचार्य के साथ टीपू का पत्र व्यवहार भी था। जहाँ तक श्रृंगेरी मठ से सम्बन्ध हैं डॉ ऍम गंगाधरन मातृभूमि साप्ताहिक जनवरी 14-20,1990 में एक लेख में लिखते है की टीपू सुल्तान भूत प्रेत आदि में विश्वास रखता था।  उसने श्रृंगेरी मठ के आचार्यों को धार्मिक अनुष्ठान करने के लिए दान भेजा जिससे उसकी सेना पर भूत- प्रेत आदि का कूप्रभाव न पड़े। पि.सी.न राजा केसरी वार्षिक 1964 में लिखते हैं की श्री रंगनाथ स्वामी मंदिर के पुजारियों द्वारा टीपू सुल्तान के लिए एक भविष्यवाणी करी थी जिसके अनुसार अगर टीपू सुल्तान मंदिर में एक विशेष धार्मिक अनुष्ठान करवाता था जिससे उसे दक्षिण भारत का सुलतान बनने से कोई रोक नहीं सकता। अंग्रेजों से एक बार युद्ध में विजय प्राप्त होने का श्रेय टीपू ने ज्योतिषों की उस सलाह को दिया था जिसके कारण उसे युद्ध में विजय प्राप्त हुई, इसी कारण से टीपू ने उन ज्योतिषियों को और मंदिर को ईनाम रुपी सहयोग देकर सम्मानित किया था। इस प्रसंग को सेकुलर लाबी टीपू को हिन्दू मुस्लिम एकता के रूप में प्रतिपादित करने का प्रयास करते हैं जबकि सत्य कुछ ओर हैं।
                                       टीपू द्वारा हिन्दुओं पर किया गए अत्याचार उसकी निष्पक्ष होने  की भली प्रकार से पोल खोलते हैं।

1. डॉ गंगाधरन जी ब्रिटिश कमीशन कि रिपोर्ट के आधार पर लिखते है की ज़मोरियन राजा के परिवार के सदस्यों को और अनेक नायर हिन्दुओं को टीपू द्वारा जबरदस्ती सुन्नत कर मुसलमान बना दिया गया था और गौ मांस खाने के लिए मजबूर भी किया गया था।
2. ब्रिटिश कमीशन रिपोर्ट के आधार पर टीपू सुल्तान के मालाबार हमलों 1783-1791 के समय करीब 30,000  हिन्दू नम्बूदरी मालाबार में अपनी सारी धनदौलत और घर-बार छोड़कर त्रावनकोर राज्य में आकर बस गए थे।
3. इलान्कुलम कुंजन पिल्लई लिखते है की टीपू सुल्तान के मालाबार आक्रमण के समय कोझीकोड में 7000 ब्राह्मणों के घर थे जिसमे से 2000 को टीपू ने नष्ट कर दिया था और टीपू के अत्याचार से लोग अपने अपने घरों को छोड़ कर जंगलों में भाग गए थे।  टीपू ने औरतों और बच्चों तक को नहीं बक्शा था। जबरन धर्म परिवर्तन के कारण मापला मुसलमानों की संख्या में अत्यंत वृद्धि हुई जबकि हिन्दू जनसंख्या न्यून हो गई।
4.  विल्ल्यम लोगेन मालाबार मनुएल में टीपू द्वारा तोड़े गए हिन्दू मंदिरों काउल्लेख करते हैं जिनकी संख्या सैकड़ों में है।
5.  राजा वर्मा केरल में संस्कृत साहित्य का इतिहास में मंदिरों के टूटने का अत्यंत वीभत्स विवरण करते हुए लिखते हैं की हिन्दू देवी देवताओं की मूर्तियों को तोड़कर व पशुओं के सर काटकर मंदिरों को अपवित्र किया जाता था।
6.  मसूर में भी टीपू के राज में हिन्दुओं की स्थिति कुछ अच्छी न थी। लेवईस रईस के अनुसार श्री रंगपटनम के किले में केवल दो हिन्दू मंदिरों में हिन्दुओं को दैनिक पूजा करने का अधिकार था बाकी सभी मंदिरों की संपत्ति जब्त कर ली गई थी। यहाँ तक की राज्य सञ्चालन में हिन्दू और मुसलमानों में भेदभाव किया जाता था।  मुसलमानों को कर में विशेष छुट थी और अगर कोई हिन्दू मुसलमान बन जाता था तो उसे भी छुट दे दी जाती थी। जहाँ तक सरकारी नौकरियों की बात थी हिन्दुओं को न के बराबर सरकारी नौकरी में रखा जाता था कूल मिलाकर राज्य में 65 सरकारी पदों में से एक ही प्रतिष्ठित हिन्दू था तो वो केवल और केवल पूर्णिया पंडित था।
7.  इतिहासकार ऍम. ए. गोपालन के अनुसार अनपढ़ और अशिक्षित मुसलमानों को आवश्यक पदों पर केवल मुसलमान होने के कारण नियुक्त किया गया था।
8. बिदुर,उत्तर कर्नाटक का शासक अयाज़ खान था जो पूर्व में कामरान नाम्बियार था, उसे हैदर अली ने इस्लाम में दीक्षित कर मुसलमान बनाया था।  टीपू सुल्तान अयाज़ खान को शुरू से पसंद नहीं करता था इसलिए उसने अयाज़ पर हमला करने का मन बना लिया। जब अयाज़ खान को इसका पता चला तो वह बम्बई भाग गया. टीपू बिद्नुर आया और वहाँ की सारी जनता को इस्लाम कबूल करने पर मजबूर कर दिया था।  जो न बदले उन पर भयानक अत्याचार किये गए थे।  कुर्ग पर टीपू साक्षात् राक्षस बन कर टूटा था।  वह करीब 10,000 हिन्दुओं को इस्लाम में जबरदस्ती परिवर्तित किया गया।  कुर्ग के करीब 1000 हिन्दुओं को पकड़ कर श्री रंगपटनम के किले में बंद कर दिया गया जिन पर इस्लाम कबूल करने के लिए अत्याचार किया गया बाद में अंग्रेजों ने जब टीपू को मार डाला तब जाकर वे जेल से छुटे और फिर से हिन्दू बन गए। कुर्ग राज परिवार की एक कन्या को टीपू ने जबरन मुसलमान बना कर निकाह तक कर लिया था। ( सन्दर्भ पि.सी.न राजा केसरी वार्षिक 1964)
9. विलियम किर्कपत्रिक ने 1811 में टीपू सुल्तान के पत्रों को प्रकाशित किया था जो उसने विभिन्न व्यक्तियों को अपने राज्यकाल में लिखे थे। जनवरी 19,1790 में जुमन खान को टीपू पत्र में लिखता हैं की मालाबार में 4 लाख हिन्दुओं  को इस्लाम में शामिल किया है।  अब मैंने त्रावणकोर के राजा पर हमला कर उसे भी इस्लाम में शामिल करने का निश्चय किया हैं। जनवरी 18,1790 में सैयद अब्दुल दुलाई को टीपू पत्र में लिखता है की अल्लाह की रहमत से कालिक्ट के सभी हिन्दुओं को इस्लाम में शामिल कर लिया गया है, कुछ हिन्दू कोचीन भाग गए हैं उन्हें भी कर लिया जायेगा। इस प्रकार टीपू के पत्र टीपू को एक जिहादी गिद्ध से अधिक कुछ भी सिद्ध नहीं करते।
10. मुस्लिम इतिहासकार पि. स. सैयद मुहम्मद केरला मुस्लिम चरित्रम में लिखते हैं की टीपू का केरल पर आक्रमण हमें भारत पर आक्रमण करने वाले चंगेज़ खान और तिमूर लंग की याद दिलाता हैं।
                           इस लेख में टीपू के अत्याचारों का अत्यंत संक्षेप में विवरण दिया गया हैं। अगर सत्य इतिहास का विवरण करने लग जाये तो हिंदुयों पर किया गए टीपू के अत्याचारों का बखान करते करते पूरा ग्रन्थ ही बन जायेगा।  सबसे बड़ी विडम्बना मुसलमानों के साथ यह है की इन लेखों को पढ़ पढ़ कर दक्षिण भारत के विशेष रूप से केरल और कर्नाटक के मुसलमान वाह वाह कर रहे होंगे जबकि सत्यता यह हैं टीपू सुल्तान ने लगभग 200 वर्ष पहले उनके ही हिन्दू पूर्वजों को जबरन मुसलमान बनाया था। यही स्थिति पाकिस्तान में रहने वाले मुसलमानों की हैं जो अपने यहाँ बनाई गई परमाणु मिसाइल का नाम गर्व से गज़नी और गौरी रखते हैं जबकि मतान्धता में वे यह तक भूल जाते हैं की उन्ही के हिन्दू पूर्वजों पर विधर्मी आक्रमणकारियों ने किस प्रकार अत्याचार कर उन्हें हिन्दू से मुसलमान बनाया था।



भाग 2

क्या औरंगजेब धर्मनिरपेक्ष था?
एक अन्य लेख द्वारा हिन्दुओं पर असंख्य अत्याचार करने वाले औरंगजेब को निष्पक्ष बनाने का असफल प्रयास हैं। स्वतंत्र भारत में इतिहास विषय के साथ सबसे बड़ा मजाक यह हुआ हैं की अपने अपने राजनैतिक हितों को पूरा करने के लिए पाठ्यक्रम में मनमाने परिवर्तन किये गए जिससे की विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों के लिए निष्पक्ष रूप से इतिहास पर अनुसन्धान करने की संभावना लगभग न के बराबर ही हो गयी हैं जैसे की भारत पर आक्रमण करने वाले मुहम्मद गोरी और गजनी को महान बता कर उनकी अनुशंसा करन।  वामपंथी और मुस्लिम इतिहासकारों की खास बात यह भी हैं की इतिहास में जहाँ जहाँ मुस्लिम आक्रान्ताओं ने हिन्दुओं पर विजय प्राप्त की हैं उसकी बढ़ा चढ़ा कर प्रशंसा की गयी हैं, जबकि हिन्दू राजाओं द्वारा प्राप्त की गयी विजय को लगभग नकार हो दिया गया हैं।  भूल चुक से वीर शिवाजी और महाराणा प्रताप का नाम अगर किसी ने ले भी लिया तो उस पर धार्मिक कट्टरवाद का आरोप लगाने में कोई पीछे नहीं रहता।  इसी कड़ी में इस लेख के लेखक का नाम लेना भी कोई गलत न होगा।  किसी काल में भारत के सभी मुसलमानों के पूर्वज हिन्दू ही रहे थे पर इस्लाम ग्रहण करने के कारण मर्यादा पुरुषोतम श्री राम और योगिराज श्री कृष्ण उनके लिए आदर्श नहीं रहे और हिन्दुओं पर पाशविक अत्याचार करने वाले टीपू सुल्तान और औरंगजेब उनके लिए सबसे आदर्श व्यक्तियों में से एक बन गए। भारत में इस्लामिक आक्रान्ताओं का इतिहास मूलत: उन मुस्लिम लेखकों द्वारा लिखा गया था जो उन्ही आक्रान्ताओं के वेतन भोगी कर्मचारी थे इसलिए यह स्वाभाविक ही था की वे अपने ही आकाओं के गुणों को बड़ा चड़ा कर लिखते हैं और दोषों को छुपाते हैं। प्रसिद्द इतिहास लेखक इलिओत एंड डावसन [Eliot and DawsonThe History of India, as Told by Its Own Historians. The Muhammadan Period vol . 1 -8 1867 -1877] के अनुसार मुस्लिम लेखकों की विश्वसनीयता इसी कारण से कम ही हैं क्यूंकि उन्होंने अनेक स्थानों पर अतिश्योक्ति युक्त वर्णन अधिक किये हुए हैं।

आईये औरंगजेब की तथाकथित धर्म निरपेक्षता को इतिहास के तराजू में तोल कर उनका मूल्याँकन करे।

औरंगजेब के विषय में लेखक दुनिया के सबसे अनभिज्ञ प्राणी के समान व्यवहार करते हुए कहता हैं की औरंगजेब ने अपने आदेशों में किसी भी हिन्दू मंदिर को न तोड़ने का हुकुम नहीं दिया।  सत्य तो इतिहास हैं और इतिहास का आंकलन अगर औरंगजेब के फरमानों से ही किया जाये तो निष्पकता उसे ही कहेंगे। फ्रेंच इतिहासकार फ़्रन्कोइस गौटियर (Francois Gautier) ने औरंगजेब द्वारा फारसी भाषा में जारी किये गए फरमानों को पूरे विश्व के समक्ष प्रस्तुत कर सभी सेकुलर वादियों के मुहँ पर ताला लगा दिया जिसमे हिन्दुओं को इस्लाम में दीक्षित करने और हिन्दू मंदिरों को तोड़ने की स्पष्ट आज्ञा थी।   इस्लाम कीस्थापना के बाद चार में से तीन खलीफा असमय मृत्यु को प्राप्त हुए और उनकी मृत्यु का कारण गैर मुस्लिम नहीं अपितु मुस्लिम ही थे, औरंगजेब भी उसी परंपरा का निरवाहन करता हुआ “आलमगीर” बनने की चाहत में अपनी सगे भाइयों की गर्दन पर छुरा चलाने से और अपने बूढ़े बाप को जेल में डालकर प्यासा मारने से नहीं चूकता तो उससे हिन्दू प्रजा की सलामती की इच्छा रखना बेईमानी होगी।  लेखक ने बनारस के विश्वनाथ मंदिर को दहाने के पीछे विशम्बर नाथ पाण्डेय (B.N.Pandey) का सन्दर्भ देते हुए यह कारण बताया हैं की औरंगजेब बंगाल जाते समय बनारस से गुजर रहा था।  उसके काफिले के हिन्दू राजाओं ने उससे विनती करी की अगर बनारस में एक दिन का पड़ाव कर लिया जाये तो उनकी रानियाँ बनारस में गंगा स्नान और विश्वनाथ मंदिर में पूजा अर्चना करना चाहती है। औरंगजेब ने यह प्रस्ताव फ़ौरन स्वीकार कर लिया।  उनकी रानियों ने गंगा स्नान भी किया और मंदिर में पूजा करने भी गई। लेकिन एक रानी मंदिर से वापिस नहीं लौटी।  औरंगजेब ने अपने बड़े अधिकारियों को मंदिर की खोज में लगाया। उन्होंने पाया की दिवार में लगी हुई मूर्ति के पीछे एक खुफियाँ रास्ता है और मूर्ति हटाने पर यह रास्ता एक तहखाने में जाता है।  उन्होंने तहखाने में जाकर देखा की यहाँ रानी मौजूद हैं जिसकी इज्जत लूटी गयी और वह चिल्ला रही थी।  यह तहखाना मूर्ति के ठीक नीचे बना हुआ था। राजाओं ने सख्त कार्यवाही की मांग की।  औरंगजेब ने हुक्म दिया की चूँकि इस पावन स्थल की अवमानना की गयी हैं, इसलिए विश्वनाथ की मूर्ति यहाँ से हटाकर कही और रख दी जाये और दोषी महंत को गिरफ्तार कर सख्त से सख्त सजा दी जाये। यह थी विश्वनाथ मंदिर तोड़ने की पृष्ठभूमि जिसे डॉक्टर पट्टाभि सीतारमैया ने अपनी पुस्तक Feather and the stones में भी लिखा हैं। आइये लेखक के इस प्रमाण की परीक्षा करे –
 1. सर्वप्रथम तो औरंगजेब के किसी भी जीवन चरित में ऐसा नहीं लिखा हैं की वह अपने जीवन काल में युद्ध के लिए कभी बंगाल गया था।
 2 . औरंगजेब के व्यक्तित्व से स्पष्ट था की वह हिन्दू राजाओं को अपने साथ रखनानापसंद करता था क्यूंकि वह उन्हें काफ़िर समझता था।
3. युद्ध में लाव लश्कर को ले जाया जाता हैं नाकि सोने से लदी हुई रानियों की डोलियाँ लेकर जाई जाती है।
4. जब रानी गंगा स्नान और मंदिर में पूजा करने गयी तो क्या उनके साथ सुरक्षा की दृष्टी से कोई सैनिक नहीं थे जो उसका अपहरण बिना कोलाहल के हो गया।
5. दोष विश्वनाथ की मूर्ति का था अथवा पाखंडी महंत का तो सजा केवल महंत को मिलनी चाहिए थी, हिन्दुओं के मंदिर को तोड़कर औरंगजेब क्या हिन्दुओं की आस्था से खिलवाड़ नहीं कर रहा था।
6. पट्टाभि जी की जिस पुस्तक का प्रमाण लेखक दे रहे हैं सर्वप्रथम तो वह पुस्तक अब अप्राप्य हैं दूसरे उस पुस्तक में इस घटना के सन्दर्भ में लिखा हैं की इस तथ्य का कोई लिखित प्रमाण आज तक नहीं मिला है केवल लखनऊ में रहना वाले किसी मुस्लिम व्यक्ति को किसी दुसरे व्यक्ति ने इसका मौखिक वर्णन देने के बाद इस का प्रमाण देने का वचन दिया था पर उसकी असमय मृत्यु से उसका प्रमाण प्राप्त न हो सका।  इस व्यक्ति के मौखिक वर्णन को प्रमाण बताना इतिहास का मजाक बनाने के समान ही है। कूल मिला कर यह औरंगजेब को निष्पक्ष घोषित करने का एक असफल प्रयास के अतिरिक्त ओर कुछ नहीं है।
औरंगजेब द्वारा हिन्दू मंदिरों को तोड़ने के लिए जारी किये गए फरमानों का कच्चाचिट्ठा।

13 अक्तूबर,1666- औरंगजेब ने मथुरा के केशव राय मंदिर से नक्काशीदार जालियों को जोकि उसके बड़े भाई दारा शिको द्वारा भेंट की गयी थी को तोड़ने का हुक्म यह कहते हुए दिया की किसी भी मुसलमान के लिए एक मंदिर की तरफ देखने तक की मनाही हैंऔर दारा शिको ने जो किया वह एक मुसलमान के लिए नाजायज हैं।
12 सितम्बर 1667 को औरंगजेब के आदेश पर दिल्ली के प्रसिद्द कालकाजी मंदिर को तोड़ दिया गया।
9 अप्रैल 1669 को मिर्जा राजा जय सिंह, अम्बेर की मौत के बाद औरंगजेब के हुक्म से उसके पूरे राज्य में जितने भी हिन्दू मंदिर थे उनको तोड़ने का हुक्म देदिया गया और किसी भी प्रकार की हिन्दू पूजा पर पाबन्दी लगा दी गयी जिसके बाद केशव देव राय के मंदिर को तोड़ दिया गया और उसके स्थान पर मस्जिद बना दी गयी। मंदिर की मूर्तियों को तोड़ कर आगरा लेकर जाया गया और उन्हें मस्जिद की सीढियों में दफ़न करदिया गया और मथुरा का नाम बदल कर इस्लामाबाद कर दिया गया।  इसके बाद औरंगजेब ने गुजरात में सोमनाथ मंदिर का भी विध्वंश कर दिया।
5 दिसम्बर 1671 को औरंगजेब के शरीया को लागु करने के फरमान से गोवर्धन स्थित श्री नाथ जी की मूर्ति को पंडित लोग मेवाड़ राजस्थान के सिहाद गाँव ले गए जहाँ के राणा जी ने उन्हें आश्वासन दिया की औरंगजेब की इस मूर्ति तक पहुँचने से पहले एक लाख वीर राजपूत योद्धाओं को मरना पड़ेगा।
25 मई 1679 को जोधपुर से लूटकर लाई गयी मूर्तियों के बारे में औरंगजेब ने हुकुम दिया की सोने-चाँदी-हीरे से सज्जित मूर्तियों को जिलाल खाना में सुसज्जित कर दिया जाये और बाकि मूर्तियों को जमा मस्जिद की सीढियों में गाड़ दिया जाये.
23 दिसम्बर 1679 को औरंगजेब के हुक्म से उदयपुर के महाराणा झील के किनारे बनाये गए मंदिरों को तोड़ा गया।  महाराणा के महल के सामने बने जगन्नाथ के मंदिर को मुट्ठी भर वीर राजपूत सिपाहियों ने अपनी बहादुरी से बचा लिया।
22 फरवरी 1680 को औरंगजेब ने चित्तोड़ पर आक्रमण कर महाराणा कुम्भा द्वारा बनाएँ गए 63 मंदिरों को तोड़ डाला।
1 जून 1681 को औरंगजेब ने प्रसिद्द पूरी का जगन्नाथ मंदिर को तोड़ने का हुकुम दिया।
13 अक्टूबर 1681 को बुरहानपुर में स्थित मंदिर को मस्जिद बनाने का हुकुमऔरंगजेब द्वारा दिया गया।
13 सितम्बर 1682 को मथुरा के नन्द माधव मंदिर को तोड़ने का हुकुम औरंगजेबद्वारा दिया गया।
                    इस प्रकार अनेक फरमान औरंगजेब द्वारा हिन्दू मंदिरों को तोड़ने के लिए जारीकिये गए. इस्लामिक लेखक इन फरमानों को कैसे नकार सकते है। अन्यथा प्रत्येक फरमान को सही सिद्ध करने के लिए एक नई कहानी बनाने की आवश्यकता पड़ेगी।

हिन्दुओं पर औरंगजेब द्वारा अत्याचार करना

2 अप्रैल 1679 को औरंगजेब द्वारा हिन्दुओं पर जजिया कर लगाया गया जिसका  हिन्दुओं ने दिल्ली में बड़े पैमाने पर शांतिपूर्वक विरोध किया परन्तु उसे बेरहमी से कुचल दिया गया। इसके साथ साथ मुसलमानों को करों में छूट दे दी गई जिससे हिन्दू अपनी निर्धनता और कर न चूका पाने की दशा में इस्लाम ग्रहण कर ले। 16 अप्रैल 1667 को औरंगजेब ने दिवाली के अवसर पर आतिशबाजी चलाने से और त्यौहार बनाने से मना कर दिया गया। इसके बाद सभी सरकारी नौकरियों से हिन्दू कर्मचारियों को निकल कर उनके स्थान पर मुस्लिम कर्मचारियों की भर्ती का फरमान भी जारी कर दिया गया। हिन्दुओं को शीतला माता, पीरप्रभु आदि के मेलों में इकठ्ठा न होने का हुकुम दिया गया। हिन्दुओं को पालकी,हाथी,घोड़े की सवारी की मनाई कर दी गयी। कोई हिन्दू अगर इस्लाम ग्रहण करता तो उसे कानूनगो बनाया जाता और हिन्दू पुरुष को इस्लाम ग्रहण करने पर 4 रुपये और हिन्दू स्त्री को 2 रुपये मुसलमान बनने के लिए दिए जाते थे। ऐसे न जाने कितने अत्याचार औरंगजेब ने हिन्दू जनता पर किये और आज उसी द्वारा जबरन मुस्लिम बनाये गए लोगों के वंशज उसका गुण गान करते नहीं थकते। इतिहास में शायद ही ऐसे मुर्खता कहीं और दिखेगी। इन प्रमाणों से स्पष्ट सिद्ध होता हैं की औरंगजेब और टीपू सुल्तान सेक्युलर नहीं अपितु मतान्ध शासक थे जिन्होंने हिन्दुओं पर अनगिनत अत्याचार किये थे।